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महापुराण कथा में सुनाई कामदेव के भस्म होने की कथा, शिव के क्रोध और रति की तपस्या का किया वर्णन

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देवताओं को तारकासुर के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए कामदेव ने भंग की थी महादेव की समाधि

विश्व मोहन बाजपेई

शाहजहांपुर। रामलीला मैदान में चल रही महापुराण कथा में कथा व्यास प्रशांत प्रभु जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भगवान शिव, कामदेव और देवी रति से जुड़ी कथा सुनाई। उन्होंने कामदेव के भस्म होने, रति की कठोर तपस्या और बाद में कामदेव के प्रद्युम्न के रूप में पुनर्जन्म की कथा का विस्तार से वर्णन किया।

कथा व्यास ने बताया कि एक समय देवताओं पर तारकासुर नामक राक्षस का आतंक छा गया था। उसके अत्याचारों से देवता परेशान थे। ब्रह्मा जी के अनुसार तारकासुर का वध केवल भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र के हाथों ही संभव था। लेकिन उस समय महादेव गहरी तपस्या में लीन थे। ऐसे में देवताओं ने कामदेव से भगवान शिव की समाधि भंग करने और देवताओं की सहायता करने का आग्रह किया।


वसंत ऋतु के साथ कैलाश पहुंचे कामदेव

प्रशांत प्रभु जी महाराज ने कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि देवताओं के आग्रह पर कामदेव वसंत ऋतु को साथ लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे। वातावरण में चारों ओर वसंत का प्रभाव दिखाई देने लगा। कोयल की मधुर आवाज गूंजने लगी, पेड़ों पर फूल खिल उठे और वातावरण में मंद सुगंध फैल गई।

कामदेव अपने पुष्प बाण लेकर महादेव के समीप पहुंचे। उन्होंने देवी रति के साथ मिलकर भगवान शिव की समाधि भंग करने का प्रयास किया और उन पर अपना सबसे प्रभावशाली पुष्प बाण चला दिया।

बाण लगते ही भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई। महादेव ने जब अपनी तीसरी आंख खोली तो उनके सामने कामदेव दिखाई दिए। भगवान शिव के क्रोध से निकली अग्नि ने कामदेव को तत्काल भस्म कर दिया।

रति के विलाप पर शिव ने दिया वरदान

कामदेव के भस्म होने के बाद उनकी पत्नी देवी रति विलाप करने लगीं। उन्होंने भगवान शिव से अपने पति को वापस करने की प्रार्थना की। रति की पीड़ा देखकर भगवान शिव शांत हुए और उन्होंने वरदान दिया कि कामदेव अब अनंग यानी बिना शरीर के रूप में रहेंगे और उचित समय आने पर पुनः अपने साकार रूप में जन्म लेंगे।

कथा व्यास ने बताया कि देवी रति ने अपने पति को वापस पाने के लिए कठोर तपस्या की। बाद में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ और उनके पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। कार्तिकेय ने तारकासुर के साथ भयंकर युद्ध किया और अंत में उसका वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।

द्वापर युग में प्रद्युम्न के रूप में हुआ पुनर्जन्म

कथा के दौरान बताया गया कि देवी रति की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण धरती पर अवतरित होंगे, तब कामदेव उनके पुत्र प्रद्युम्न के रूप में पुनर्जन्म लेंगे। रति भी उनकी पत्नी के रूप में उनके साथ पुनः जुड़ीं।

प्रशांत प्रभु जी महाराज ने कहा कि इस प्रकार कामदेव अनंग रूप में ही प्रेम का कार्य करते रहे। उनका संदेश यह है कि प्रेम केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भाव और अनुभूति के रूप में हर हृदय में विद्यमान रहता है।

कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने धार्मिक प्रसंगों को भक्तिभाव से सुना। कार्यक्रम में ओम देव गुप्ता, सत्य प्रकाश मिश्रा, श्री दत्त शुक्ला, ब्लॉक प्रमुख कांट, हरि शरण बाजपेई, अखिलेश सिंह, गौरव त्रिपाठी, विश्व मोहन बाजपेई, अरविंद त्रिपाठी और नीरज बाजपेई सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं क्षेत्रीय लोग मौजूद रहे।

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